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-क्या द्रोण बनाने वाले गुरू को भी मिलेगा, द्रोणाचार्य का सम्मान।

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श्रीप्रकाश ने हाकी के द्रोणाचार्य पुरस्कार पर मजबूती के साथ ठोका अपना दावा।
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नई दिल्ली,18 अगस्त। गुरू गुड ही रहा,चेला चीनीं ले चला, यह कहावत भारतीय खेल प्राधिकरण के हाकी कोच श्रीप्रकाश पर पूरी तरह से सही बैठती है। उनकी कोचिंग से निकले सैकडों बच्चे हाकी खेल में अपनी छाप बनाकर आगे निकल गए। मगर गुरू आज भी नये शिष्य को तराशने में ही जुटे है। उनका सम्मान कब होगा, यह उनको भी नहीं पता। लेकिन इस बार उन्होंने खेल मंत्रालय द्वारा 29 अगस्त को दिए जाने वाले खेल पुरस्कारों में द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए अपना दावा ठोक डाला है।

पिछले 20 सालों से अधिक प्राइवेट और सरकारी कोचिंग करने वाले श्रीप्रकाश ने कभी भारतीय हाकी टीम के चीफ कोच रहे हरेन्द्र सिंह को हाकी की स्टीक थमाई थी। जिसके बाद हरेन्द्र ने पीछे मुडकर नहीं देखा, फिर एक ऐसा समय भी आया कि वह भारतीय हाकी टीम के चीफ कोच बनें और एशियाई, काम्नवेल्थ आदि कई टूर्नामेंट भारत की झोली में पदक के रूप मंे डाले।
हरेन्द्र की इस सफलता पर उनको भारत सरकार द्वारा गुरू के रूप में दिए जाने वाला सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार गुरू द्रोणाचार्य  2012 में राष्टृपति द्वारा प्रदान किया गया।
मगर उसी द्रोणाचार्य के गुरू श्रीप्रकाश को आज भी सरकार ने कोई मान सम्मान वाला पुरस्कार देकर सम्मानित नहीं किया है। ऐसे में चेले ने तो देश का श्रेष्ठ पुरस्कार पा लिया। अब गुरू की बारी कब आयेगी, यह समय बतायेगा। मगर गुरू श्रीप्रकाश ने इस साल द्रोणाचार्य पुरस्कार के लिए अपना नाम सरकार को भेजा है।
इस पुरस्कार के लिए श्रीप्रकाश का दावा मजबूत क्यों होता है। इसके पीछे का कारण है कि वर्तमान टोक्यो ओलंपिक 2020 में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हाकी टीम में उनके 2 शिष्य भी शामिल है। जिन्होंने उनको कोच होने की पुष्टि भी की है। यह पदक देश को 41 साल के उपरांत मिल पाया है। यह ओलंपियन सुमित बाल्मीकि व सुरेन्द्र कुमार है।
इनके अलावा 2010 काम्नवेल्थ में भरत चिकारा, एशिया कप विजेता टीम सदस्य, जूनियर विश्व कप टीम में जोगिंदर, राजेन्द्र, रोशन मिंज भी उनके ही शिष्य थे। यहीं नहीं राष्टृीय स्कूली खेलों में वह 20 से अधिक बार दिल्ली को अपनी मेहनत से पदक दिला चुके है।
दिल्ली मंे हाकी का गढ कहे जाने वाले यूनियन एकेडमी स्कूल से हाकी के अपने शुरूआती गुर सिखने वाले श्रीप्रकाश 1983 के बाद से अभी तक वहां स्थापित अकादमी को सिंचने का काम कर रहे है। वह अपनी गुरू की परंपरा को निभाते हुए करीबन 100 से अधिक राज्य स्तरीय व 50 से 60 खिलाडियों को राष्टृीय स्तर पर पहुंचा चुके है। यहीं नहीं अपनी मेहनत के बल पर वह खूद भी 10 बार राज्य स्तर पर दिल्ली का प्रतिनिधित्व कर चुके है। ?
वर्तमान में वह भारतीय खेल प्राधिकरण में एक कोच की भूमिका निभाते हुए पिछले 1092 से हाकी को आगे ले जाने का काम कर रहे है।
ऐसे में इतनी मेहनत के उपरांत अगर उनको सम्मान नहीं मिलता जिसके की वह हकदार है, तो फिर कौन गुरू की भूमिका निभाने की सोचेगा, यह कहा नहीं जा सकता। फिलहाल उनका दावा द्रोणाचार्य से कम नहीं है।

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